तृतीय अध्याय -- अश्व और रथ


तृतीय अध्याय

अश्व और रथ

वेद में अश्व का सम्बन्ध देवरथों से इतना घनिष्ठ है कि अश्वों को इसी कारण रथ्या1 अथवा रथ्यासः2 भी कहा जाता है। विभिन्न देवों के रथ को खींचने वाले अश्व कभी-कभी विभिन्न नामों से जाने जाते हैं। उदाहरण के लिए सूर्य के अश्व का नाम एतश है और कहीं-कहीं उसके अश्वों को हरित भी कहा जाता है । इन्द्र के रथ को प्राय: दो हरी खींचते हैं; कहीं-कहीं अनेक हरयः का भी उल्लेख मिलता है। इस प्रकार अग्नि का रोहित, अश्विनौ के रासभ, पूषा का अज, मरुतों के पृषत्यः, उषाओं के अरुण्यः, सविता के श्यावाः, बृहस्पति के विश्वरूपा और वायु के नियुता नामक विशेष अश्व बतलाए गए हैं; परन्तु इन नामों में से एतश ही ऐसा नाम है जो निघण्टु के अश्वनामों में परिगणित है।

इन अश्वों के अतिरिक्त कुछ और भी विशेष अश्व हैं जिनका संबंध रथ से है । दधिक्रा नामक अश्व रथ को तीव्रगति से ले जाने वाला4 तथा अपने रथ को प्रथम पंक्ति5 में ले जाने वाला कहा जाता है। दधिक्रा नाम भी निघण्टु की अश्वनामों की सूची में सम्मिलित किया गया है। एक स्थान पर एक ऐसा एकचक्र रथ है जिससे सात अश्व जोड़े जाते हैं, अथवा यह भी कहा जा सकता है कि एक ही अश्व है जिसके सात नाम हैं। इस रथ के चक्र की तीन नाभि हैं जहाँ विश्वभुवन अधिष्ठित कहे6 जाते हैं । इसी रथ के विषय में यह भी कहा जाता है कि इस रथ पर कोई सात बैठे हुए हैं। वह सात चक्रों का रथ है और उसे सात ही घोड़े खींचते7 हैं।

अतः प्रश्न होता है कि अश्व अथवा अश्वों से सम्बन्धित रथ है क्या ? इस प्रश्न का उत्तर है मनुष्यरथ । मनुष्यनामों की व्याख्या करते हुए डॉ. श्रद्धा चौहान ने मनुष्यरथ की बहुत सुन्दर व्याख्या की है। उनकी यह

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1 रथ्यः अश्वा ....."। ऋ. 3.6.8

रथ्यं अश्वं.....। वही, 8.103.7, तुलनीय वही, 1.148.3, 9.97.50

2 रथ्यासः अश्वाः..... । वही, 6.37.3

3 निघण्टु 1.15

4 पड्भिर्गृध्यन्तं मेधयुं न शूरं रथतुरं वातमिव ध्रजन्तम् । ऋ. 4.38.3

5 उत स्मासु प्रथमः सरिष्यन्नि देवेति श्रेणिभी रथानाम् । वही, 4.38.6

6 सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा ।।

त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वा भुवनाधि तस्थुः ।। वही, 1.164.2

7 इमं रथमधि ये सप्त तस्थुः सप्तचक्रं सप्त वहन्त्यश्वाः ।।

सप्त स्वसारो अभि सं नवन्ते यत्र गवां निहिता सप्त नाम ।। वही, 1.164.3


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व्याख्या मुख्यतः ऋग्वेद के निम्नलिखित मन्त्र पर आधारित है

प्राता रथो नवो योजि सस्निश्चतुर्युगस्त्रिकशः सप्त रश्मिः ।।

दशारित्रो मनुष्यः स्वर्षाः स इष्टिभिर्मतिभी रंह्यो भूत् ।। ऋ. 2.18.1

निस्सन्देह यहाँ मनुष्य व्यक्तित्व की ही एक रथ के रूप में कल्पना की गई है। यह प्रात.काल जोड़े जाने वाला नव मनुष्यरथ है जिसे चतुर्युग, त्रिकश, सप्तरश्मि, दशारित्र, स्वर्षा तथा इष्टियों एवं मतियों द्वारा रंहणीय कहा जाता है । यह रहस्यमय रथ वही प्रतीत होता है जिसको पहले सप्तचक्र कहा गया है और जिसे सात अश्व अथवा सप्त नाम वाला एक अश्व वहन करता है। इससे कुछ भिन्न एक पूर्व रथ का उल्लेख भी मिलता है जिसमें यथार्थ ज्ञान, सम्यक् अभिव्यक्ति एवं पूर्ण पोषण1 के साधन बनने की ऐसी सम्भावनाएँ निहित हैं जिनके प्रकटीकरण द्वारा जीवन को महान् रमणीय वस्तु बनाने के लिए, उस रथ पर ‘सत्य-सत्त्व इन्द्र2' को आसीन होने हेतु आमन्त्रित किया जाता है, क्योंकि मरुद्गण सहित इन्द्र ही इस रथ को निर्विघ्न उपायों द्वारा वांछनीय दिशा दे सकता है। यह रथ अपने सहज रूप में पीछे रहने वाला रथ है जिसे आगे लाने का काम इन्द्र ही कर सकता है। अतः इन्द्र से प्रार्थना है कि 'हे इन्द्र ! हमारे पिछड़े हुए रथ को अग्रगामी करो। हे वाजयु3 ! श्रवस् को निकटतम कर दो। हमारे वाजयु रथ की रक्षा करो। तुम्हारे लिए यह सुकर है। तुम्हें इस कार्य में क्या लगता है ? हमें अच्छी तरह विजयी बना दो (ऋ. 8.80.4-6) । इन्द्र, मित्र, वरुण, मरुत एवं अदिति का आह्वान करते हुए ‘सुदानवः वसवः' से बार-बार यही निवेदन किया गया है कि वे इस रथ को सङ्कट से (दुर्गात्) बचाएँ और समस्त पाप से दूर रखें (ऋ. 1. 106.1-7) । अन्यत्र वसुओं के अतिरिक्त देवों, रुद्रों, आदित्यों एवं मित्रावरुणौ से भी इस रथ के प्रसंग में सहयोग (ऋ. 2.31.1-3) मांगा गया है।

नव मनुष्यरथ उस मानव का प्रतीक है जो पूर्वरथ नामक सहज व्यक्तित्व की बहुमूल्य सम्भावनाओं को प्रकट करने लगता है । इस रथ के स्वरूप को भली-भाँति समझने के लिए, इसके प्रसंग में प्रयुक्त अनेक पूर्वोक्त परिभाषाओं का स्पष्टीकरण आवश्यक है ।

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1.वही, 1.9.4-8

2 स सत्यसत्वन् महते रणाय रथमा तिष्ठ तुविनृम्ण भीमम् ।।

याहि प्रपथिन्नवसोप मद्रिक्प्र च श्रुत श्रावय चर्षणिभ्यः ।। वही, 6.31.5

3 वाजयु का अर्थ है वाज नामक अन्न अथवा बल का इच्छुक अथवा योजक । पहले अर्थ में यह शब्द यहाँ इन्द्र का विशेषण है और दूसरे में रथ का ।


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प्रात:  

नव मनुष्यरथ का समय प्रातःकाल है। यह प्रातः वस्तुतः साधक की अतिमानसिक यात्रा के शुभारम्भ का प्रतीक है। इसे आध्यात्मिक विहान कह सकते हैं। जहाँ प्रातः शब्द का प्रयोग इस विशेष अर्थ में हुआ है, वहाँ ऋग्वेद के पदपाठकार ने इति का प्रयोग (प्रातरिति) किया है। इस अवस्था को प्राप्त साधक को प्रातरित्व' (ऋ. 1.125.2) कह कर सम्बोधित किया जाता है। प्रातरित्वा साधक की पूर्णवस्था का प्रतीक नाम दीर्घतमा है। प्रातः के लिए दीर्घतमा की इच्छा जब साधनावशात् इष्टि का रूप धारण करती है, तभी उक्त प्रातरित्वा साधक उत्पन्न होता है। अतः उसको दीर्घतमा का इष्टि पुत्र (वही 3) कहते हैं। प्रातरित्वा उस साधक का नाम है जिसने अपनी साधना (इष्टि) द्वारा उसे प्राप्त करके अनेक ऐसी सिद्धियों को हस्तगत कर लिया है जिन्हें वेद में गो, अश्व, हिरण्य, मयोभुवः, सिन्धवः, घृतस्य धारा आदि (वही, 2-4) वसु कहा जाता है। इन्हीं वसुओं से युक्त वसुमान् रथ द्वारा सोमपान का अधिकारी (वही, 3) होता है। ये सभी सिद्धियाँ जन-जन के हिरण्यमयकोश रूपी सिन्धु में रहने वाले उस ब्रह्मरूपी राजा द्वारा प्रदत्त हैं जो भावगम्य होने से भाव्य अथवा भावयव्य (ऋ. 1.161.1) कहा जाता है । इस दृष्टि से इष्टि (साधना) के पुत्र होने का सौभाग्य भी साधक को तभी मिलता है जब भावयव्य उसे (साधना को) पूर्णतया प्रौढ़ समझता है । कविसुलभ कल्पना में वही रोमशा' है जो अपनी प्रौढ़ता का प्रमाण देती हुई कहती है --

‘सर्वाहमस्मि रोमशा गन्धारीणामिवाविका। (ऋ. 1.126.7)

प्रौढ़ साधना का फल ही वह प्रातःकाल है जब नव मनुष्य रथ यात्रा के लिए संयुक्त किया जाता है (ऋ. 2.18.1) । इस प्रातः की झलक प्रायः उन सभी सूक्तों में मिल जाती है जिनमें1 पदपाठकार प्रातः को प्रातरिति कहता है । इस प्रात:काल से सम्बन्धित रथ वही अश्विनौ का रथ है जो सूर्या के लिए प्रयुक्त किया जाता है (ऋ. 8.22.1)। यह त्रिबन्धुर रथ है जिसमें हिरण्य-रश्मियाँ लगी (ऋ. 8.22.5) हैं और रथ का सर्वोच्च स्थान हिरण्यकोश है (वही, 9)। इसी रथ में सोम रूपी ‘अव्ययवर्म' की सृष्टि (ऋ. 9.98.2) होती है और इसी को अन्यत्र त्रिचक्र (ऋ. 1.118.2, 10.85.14) रथ भी कहा जाता है ।

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1 ऋ, 1.125.2, 8.4.35, 7.41, 8.22.15, 9.8.11


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चतुयुग रथ :

नव मनुष्य रथ में जो चार युग समझे जाते हैं, उनको अन्यत्र1 परयुग, उत्तरयुग, पूर्व्ययुग और प्रथम युग कहा गया है। इन चारों की संहिता अथवा सन्निवेश अन्ततोगत्वा उस ‘उपर युग (ऋ. 7.87.4) में होती प्रतीत होती है जो वस्तुत: वही हिरण्ययकोश है जिसे पहले रथ का सर्वोच्च स्थान कहा गया है । अतएव अन्य युगों की तुलना मनुष्य व्यक्तित्व के विज्ञानमयकोश, मनोमयकोश, प्राणमयकोश तथा अन्नमयकोश से की जा सकती है जो हिरण्ययकोश के सन्दर्भ से ही ‘संहितान्तं चतुष्टयं'2 कहे जाते हैं । 'उपरयुग' तक पहुंचने का अधिकार उस मेधिर (मेधसम्पन्न) को है जिसे गुह्यविद्या के किसी विद्वान् द्वारा शिक्षा मिली (ऋ. 7.87.4) हो । ये युग वे ही हैं जिन्हें हम मनुष्य युगों अथवा मानुष युगों (ऋ. 1.103.4) के रूप में पाते हैं, क्योंकि मनुष्य और मानुष शब्द निःसन्देह उसी मनुस से निष्पन्न हैं जिसके सन्दर्भ3 से इन युगों के नाम रखे गए हैं। जिस मेधा से सम्पन्न व्यक्ति इन युगों की सर्वोच्च परिणति का पात्र माना गया है वही मेधा सुरभिर्विश्वरूपा हिरण्यवर्णा'4 अथवा हिरण्यवर्णा उषा'5 है जिसके आगमन से मनुष्य युगों के स्थान पर 'देव्या व्रतानि6 का आरम्भ हो जाता है। दिव्य व्रतों में इनकी परिणति साधना के क्रमिक विकास का परिणाम7 है। इनमें प्रत्येक युग में वैश्वानर अग्नि को समिद्ध करने (ऋ. 3.26.3), अमृतदूत का विधान करने (ऋ.6.15.8), इन्द्र को प्रजायमान करने (ऋ. 6.36.5), मरुतों का नव्य, अमृत एवं चित्र घोष श्रवण करने तथा क्षेमकामी पितरों (सहजवृत्तियों) से युक्त होने से ही साधना निरन्तर विकसित होती है ।  

ये युग वस्तुतः योग के सोपान कहे जा सकते हैं। इसीलिए युगों के सन्दर्भ में युज धातु का प्रयोग (ऋ. 10.94.12) मिलता है । अरुणा गायों के समूह को 'युक्त करने वाली उषा के साथ-साथ गृह-गृह में अग्नि की उपस्थापना (ऋ. 1.124.11) द्वारा भी इसी युग में विकसित होने वाली प्रक्रिया का ‘युङ्क्ते' क्रिया संकेत कर रही है। इन विभिन्न युगों के सन्दर्भ से मनुष्य रथ की जब अनेक रथों के रूप में कल्पना करके प्रत्येक के साथ अश्वों हरियों को युक्त करने का प्रसंग8 आता है तो भी इसी

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1 वही 1.166.13, 10.72-1-3

2 शौ 10.2

3 तु. मनुषः युगेषु । ऋ. 7.9.4

4 तैआ 10.42.1

5 ऋ. 3.61.2, 7.77, 2

6 वही, 1.92.11, 124.2

7 तु. अनु पूर्वाणि चरव्ययुर्युगानि। वही, 7.70.4

8 तु. ऋ. 5.56.5, 1.39.6, 85.4-5

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प्रकार युज् धातु का प्रयोग मिलता है। वास्तव में युग-युग में इन्द्र को प्रज्ञायमान करने (ऋ. 6.36.5) और योग-योग में (ऋ. 1.30.7) उसको अधिक बलवान् (तवस्तर) करने का समान अभिप्राय वही है जिसे गीता में अभ्यास-योग कहा गया है। प्रत्येक अभ्यास-योग से समुत्पन्न ज्ञान-किरण एक गौ है और मनुस् के उक्त सभी चार युगों की ऐसी अनेक सुन्दर गाएँ उन सभी युगों में प्रज्वलित ‘ईडेन्य जातवेदस' नामक ज्ञानाग्नि का ही तो प्रतिबोध ग्रहण1 करती हैं जिसे ‘जातं जातं विन्दते तस्माज्जातवेदाः'2 कह कर मनुष्य के सम्पूर्ण बोध का केन्द्रस्थ साधन एवं नियामक बताया जाता है। अतः नव मनुष्य रथ को चतुर्युग कहने का तात्पर्य यही है कि योग प्रक्रिया का अज्ञात प्रभाव एक साथ अन्नमय से लेकर विज्ञानमय तक होता है ।

त्रिकश रथ :

तीन कशों या कशाओं से युक्त होने के कारण उक्त नव मनुष्य रथ को त्रिकश कहा गया है। कश या कशा शब्द ‘कश गतिशासनयोः'3 से निष्पन्न होने से मूलतः शासन का साधन, गतिकारक, प्रेरक आदि कहा जा सकता है । इसी दृष्टि से लोकभाषा में उसका जो प्रयोग कोड़े (चाबुक) के लिए हुआ वह (ऋ. 1.37.3) में भी मिलता है। परन्तु, निघण्टु (1.11) में कशा वाक् का पर्यायवाची है क्योंकि वाक् ही सभी कर्मों, अनुभवों आदि का नियमन-शासन4 करने वाली है। वह वाक् केवल स्थूल वाणी नहीं अपितु वह मूल शक्ति है जो चित्वम्, जूत्वम् एवं धौत्वम्5 नामक त्रिविध गुण से सम्पन्न होने से मनुष्य की क्रमशः ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति एवं भावात्मक धारणा शक्ति के रूप में प्रकट होती है । मानसिक स्तर पर यही त्रिविध वाक् ऋक्, यजुः और साम6 नाम से त्रयी विद्या या त्रिवेद रूप में जानी जाती है। अतएव मनुष्य रूपी रथ की ये ही तीन कशाएँ हैं। अपने अव्याकृत रूप में वही अथर्वा अथवा कशा मानी जाती है। तदनुसार, अश्विनौ की मधुमती कशा (ऋ. 1.157.4), मरुतों की आत्मप्रेरक कशा (ऋ. 1.168.17) तथा अग्नि की प्रताडिनौ कशा (ऋ. 1.162.17) एक ही कही जाती है।

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1 प्रतिबुधन्त । वही, 7.9.4

2 माशब्रा 9.5.1.68

3 पाधा-1.462

4 माशब्रा-8.1.2.9, ऐआ 3.1.6, जैब्रा 1.269

5 मैसं-3.7.5

6 माशब्रा -6.5.3.4, काठसं 13.4, 9, 10, तैआ 8.3.1, तैअ 3.10.3


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मधुकशा :  

ओंकारमयी परावाक को मधुकशा कहा जाता है। यह त्रयी विद्या का अव्याकृत रूप है । जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण1 के अनुसार त्रयी विद्या अथवा त्रिवेद के रूप में यह वाक् रसरहित होती है क्योंकि उनमें से प्रणव रूप रस को प्रजापति ने पहले ही अलग कर रखा है । प्रणव जप से शनैः शनैः ऊर्ध्वगामी होता हुआ मन पूर्व्ययुग (अन्नमय) से प्रथम युग, उत्तर युग और परयुग को पार करता हुआ ‘उपरयुग' में प्रवेश करने में वह जिस आनन्द से ओतप्रोत होता है उसे ज्योतिर्मय होने से हिरण्यय, माधुर्यस्वरूप होने से मधु तथा प्रकाशपरक शब्दमय होने से मरुत् (म का रुत्) कहा जाता है। इस ऊर्ध्वमुखी यात्रा में वाक् रूप कशा की त्रिविधता एकत्व में परिणत होती हुई अन्ततोगत्वा ओंकार (प्रणव)मयी होती है । यही रस है। इसीलिए एकीभूत कशा को मधुमती कहा जाता है । इसका एक अत्यन्त सुन्दर वर्णन अथर्ववेद के मधुकशा सूक्त (9.1) में प्राप्त है । उसका सारांश इस प्रकार है-हिरण्यवर्णा मधुकशा एक महान् भर्ग (तेज) है (4), जिसे आदित्यों की माता, वसुओं की दुहिता, प्रजाओं का प्राण तथा अमृत की नाभि (केन्द्र) भी कहा जाता है । आनन्दमय कोश ही इसका रहस्यमय ‘सोमधाम अक्षित हृत्कलश' (6) है। उसके दो (प्राणापानौ) सहस्रधार स्तन (7) भी विलक्षण हैं जिनके द्वारा ऊर्जा का वितरण होता है। मधुकशा मरुतों की नप्ति है जो अग्नि एवं वात से अन्नमय कोश की भूमि पर उत्पन्न (10) होती है। अन्नमयकोश की भूमि (पृथिवी) मधुकशा का दण्ड, प्राणमय कोश रूपी अन्तरिक्ष उसका गर्भ, मनोमयकोश रूपी द्यौ कशा, विज्ञानमय कोश रूपी विद्युत् उसका प्रकाश तथा हिरण्यय (आनन्दमय कोश) उसका बिन्दु (21) है । ।

मधुकशा नामक इस भर्ग अथवा परावाक् की व्याकृत अवस्था में जो सप्तविध अनुभूति होती है, उसको पारिभाषिक शब्दावली में ब्राह्मण, राजा, धेनु, अनड्वान्, व्रीहि, यव तथा मधु नामों से सप्तमधु (22) कहा जाता है। ये सात नाम निश्चित ही सात प्रतीक हैं। जो मनुष्य के क्रमशः ब्रह्मबल, क्षत्रबल, अर्थबल, शरीरबल, निर्मलता, सहानुभूति तथा आनन्दबोध के द्योतक प्रतीक होते हैं। इन सबको मधु कहने का कारण यह है कि जिस प्रकार मधुमक्षिकाएँ मधु के छत्ते में मधु का सम्भरण करती हैं, उसी प्रकार अश्विनौ आत्मन् में इन सातों आयामों में वर्चस्, तेजस्, बल, ओजस् आदि का सम्भरण करते हैं। मधु रूप में वस्तुतः आत्मा में

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1 जैउब्रा-1.1.1


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प्रजापति का ही प्रादुर्भाव होता है । अतएव इस मधु साधना में प्राचीनोपवीत होकर ‘प्रजापतेऽनु मा बुध्यस्व' मन्त्र की अर्थभावना करने का विधान है --

तस्मात् प्राचीनोपवीतस्तिष्ठे प्रजापतेऽनु मा बुध्यस्वेति ।

अन्वेनं प्रजा अनु प्रजापतिर्बुध्यते य एवं वेद ।। शौ 9.1.24

सप्तरश्मि रथ :

सात रश्मियों रूपी रस्सियों वाला नव मनुष्य रथ वह व्यक्तित्व हैं जिसमें अहं बुद्धि, मन और पञ्च ज्ञानेन्द्रियों में दिव्य आपः प्रवाहित होकर उन्हें सप्तसिन्धवः बना देते हैं। ये सातों वस्तुतः इन्द्र की इन्द्रियशक्तियाँ हैं। अतः जहाँ सप्तरश्मि रथ को इन्द्र के उपयोग की वस्तु (ऋ. 6.44.24) माना जाता है, वहाँ स्वयं इन्द्र को भी सप्तरश्मि (ऋ. 2.12.12) कहा जा सकता है। इन सातों के सप्तसिन्धु बनकर प्रवाहित होने अथवा इन्द्रिय रूप ग्रहण करने का अभिप्राय है; पर इन्द्र (महेन्द्र) के जन्म के साथ-साथ अव्याकृत सिन्धु का उन सातों में फूट पड़ना...... अन्यथा मनुष्य रथ न तो त्रिकश कहा जा सकता है और न ही सप्तरश्मि इन्द्र ही । इन्द्र जन्म के अभाव में, मनुष्य का व्यक्तित्व तो त्रिशीर्षा सप्तरश्मि दैत्य होता हैं जिसको मारने के लिए पित्र्यायुधों के जानकार त्रित आप्त्य को अभिबुब1 होना पड़ता है। त्रित आप्त्य की तुलना उस त्रिमूर्धा सप्तरश्मि अग्नि (ऋ. 1.146.1) से की जा सकती है जो अपने अनून (पूर्ण) रूप से इन्द्र (मघवा विश्वदर्शतः; वही, 5) से भिन्न नहीं है। उसको अपने ‘अजरपद' पर प्रतिष्ठित करके ही ‘धीरासः कवयः' उस महान् सिन्धु का साक्षात् कर पाते हैं जो उक्त अहं बुद्धि आदि सप्तकाष्ठाओं में सप्तसिन्धवः बनकर प्रकट होता है। तभी वह अग्नि इन सात आयामों में सप्त सूर्य होकर आविर्भूत (वही, 4-5) होता है जिससे सम्पूर्ण अन्धकार नष्ट हो जाता है। यह वही अज्ञानान्धकार है जिसे अन्यत्र (ऋ. 4.50.4) सप्तरश्मि, सप्तास्य बृहस्पति (बृहती बुद्धि के प्रति) परम व्योमीय ज्योति से प्रादुर्भूत होकर विविध रूपेण मिटाते हुए कहे गए हैं।

दशारित्र रथ :  

नव मनुष्यरथ दश अरित्रों वाला है । भाष्यकारों ने अरित्र को प्रायः पतवार के अर्थ में लिया है और इस प्रकार उक्त रथ को पतवारों से चलने वाली एक नौका माना गया है । जब सिन्धुओं के तीर्थ में स्थित

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1 ऋ. 10.8.8


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रथ के साथ 'अरित्रं दिवस्पृथु'1 का उल्लेख होता है तो नि:सन्देह अरित्र को पतवार तथा रथ को एक नौका ही मानना पड़ता है; परन्तु जब इसी रथ को इन्दवः (सोमबिन्दवः) धी से जोड़ते हैं (वही, 8) अथवा उसे पार जाने के लिए ‘मतीनां नावा' (वही, 7) कहा जाता है तो स्पष्ट हो जाता है कि यह नौका रथ वस्तुतः एक मनोवैज्ञानिक वस्तु है। इसी तरह, जब बुद्धियों को मन्द्र एवं विस्तृत करके नाव को अरित्र परणी2 (अरित्रों द्वारा पार ले जाने वाली) बनाने के लिए बात आती है तो भी किसी आध्यात्मिक अथवा मनोवैज्ञानिक नाव के अरित्र की ही कल्पना सामने आती है। हिरण्यय मार्गों पर हिरण्ययी नौकाओं के हिरण्यय अरित्र भी हिरण्ययकोश नामक आध्यात्मिक स्तर से सम्बन्ध रखने वाले सिद्ध होते हैं जिसके भीतर ज्योतिर्मण्डित स्वर्ग में ब्रह्मविदों का वैद्य ‘आत्मवत् यक्ष'3 (ब्रह्म) स्थित माना जाता है।

 अब प्रश्न होता है कि ये आध्यात्मिक अरित्र क्या हैं ? अरित्र का शाब्दिक अर्थ 'अरि= शत्रु से त्राण करने वाला है । अहंकार रूपी अहि (वृत्र) एवं उससे प्रादुर्भात काम, क्रोधादि ही अरि हैं जिनसे जीव को त्राण अपेक्षित होता है । इनसे विपरीत उनकी नारकी गति है जो अरियों की पोषक है । जैमिनीयोपनिषद्ब्राह्मण4 के अनुसार पुरुष के भीतर दश ऐसी शक्तियाँ हैं जो स्वर्गोन्मुख होने से स्वर्ग तथा नरकोन्मुख होने से नरक कही जाती हैं। ये मन, वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, त्वक्, हस्त, गुदा, जननेन्द्रिय तथा पाद (वही, 4.11.5.1) की इन्द्रिय शक्तियाँ हैं । अतः ये ही स्वर्गोन्मुख होकर दशारित्र कही जा सकती हैं।

स्वर्षाः रथ :

नव मनुष्य रथ स्वर्षाः कहा जाता है। स्वर्षाः का अर्थ है स्वः नामक ज्योति का दाता (स्वः = षणु दाने); स्वः ज्योति नाक नामक द्युलोक से (जैब्रा 3,69) आती है। स्व को ही स्वर्गलोक (वही) अथवा दिवः (द्यु का विस्तार, काठ 39.8) कहा जाता है। अतएव मनुष्य रूपी नवरथ को स्वर्षाः कहने का अभिप्राय है कि वह स्वः ज्योति से स्वयं युक्त होकर उसका वितरण करने में भी सक्षम है। स्वः का धारण सामों (Harmonies) के बाहुल्य से सम्भव होता है और वह धरित हुआ स्वः ही

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1 ऋ. 1.46.8

2 वही, 10.101.2

3 शौ. 10.2.31-32

4 4.11.4.6


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मनुष्य का स्वर्गलोक बन जाता है –

स्वरिति सामभ्योऽधरत् स्वः स्वर्गो लोकोऽभवत् । (षब्रा 1; 5)

इस स्वः को प्राप्त करना ही अमृत' होना है।

सस्नि -रथ :

नव मनुष्यरथ को सस्निः कहने का अभिप्राय है कि उसका स्नेहसिक्त, सोमस्नात अथवा सामस्नात होना । सस्नि शब्द ‘स्ना शौचे; स्नै वेष्टने2 शोभायां च अथवा स्निह3 प्रीतौ से निष्पन्न प्रतीत होता है। यास्क ने ‘सस्निं स्नातं' कहकर उसे स्ना धातु से उद्भूत (निरु. 5.1) माना है । उदाहरण के लिए, निरुक्त में जिस स्थल (ऋ. 10.139.6) को चुना है, उसमें सस्नि शब्द को सोम के लिए ग्रहण करना अधिक समीचीन है, क्योंकि पूरे सूक्त में सोम और उससे सम्बद्ध विश्वावसु गन्धर्व का प्रसंग मुखरित हो रहा है। अन्यत्र भी सस्नि शब्द आनन्द रस रूपी सोम4 के लिए प्रयुक्त हुआ है। विभिन्न चेतना धाराओं रूपी नदियों के संचरण में (ऋ. 10.139.6) सस्नि की प्राप्ति बताई जाती है । इन नदियों का संचरण और सस्नि की प्राप्ति तभी सम्भव हो सकती है जब नदीवृत वृत्र का वध5 हो । तभी इन्द्र भी सस्नि (ऋ. 10.38.4) होता है क्योंकि तभी आपः अथवा सिन्धु प्रवाहित होते हैं और इन्द्र के लिए सोम भी सुलभ6 होता है । सस्नी हुए इन्द्राग्नी 'वाजेषु कर्मसु में प्रवृत्त होकर ‘यज्ञं श्रेष्ठतम कर्म' का बोध कराने वाले ऋत्विज (ऋ. 8.38.1) कहे जाते हैं। वाज कर्मों में इन्द्र का उग्र रूप होता है। अतः कामना की जाती है कि वह ऐसे स्नेहसिक्त रूप को धारण करे जो चर्षणी मनुष्य को सह्य (ऋ. 5.35.1) हो । अतः ऐसे स्नेहसिक्त व्यक्तित्व को सस्नि कहा जाता है। मनुष्य रूपी रथ को सस्नि कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार रथ स्नेह (तेल) से सिक्त होता है, उसी प्रकार मनुष्य भी प्रेमानन्द रूपी सोम अथवा साम से सिक्त हो ।

सोम से सिञ्चन अथवा स्नान पूर्वोक्त स्वः का धरण करने वाले

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1 जैब्रा 1.332, मैसं 1.11.3

2 स्ना शौचे (पाद्या 2.54), स्नै वेष्टने शोभायां च (पाद्या 1.657)

3 स्निह् प्रीतौ (पाद्या 4.89)

4 ऋ. 9.24.4, 61.20

5 वही, 1.52.2, 8.12.16

6 वही, 4.18.13, 6-7


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सामों (Harmonies) का ही परिणाम होता है। अतः सोम को सोमदेवस्य1 कहा जाता है। साथ ही सोम के बिना साम भी समृद्ध नहीं हो पाता। अतः साम को भी सोमदेवत्य2 कहा जाता है। इस प्रकार सस्नि शब्द में साम एवं सोम दोनों के प्रभाव का समावेश अभिप्रेत है।

रथ :

रथ से अभिप्राय किसी भी रंहणशील (गतिशील) पदार्थ से है। प्रस्तुत प्रसंग में नव मनुष्यरथ को रंह्य कह कर संकेत कर दिया गया है। कि रथ शब्द रंह् धातु से निष्पन्न है; परन्तु ‘नव मनुष्यरथ' किसी स्थूल पक्ष का द्योतक न होकर मनुष्य के सूक्ष्म चेतन पक्ष का बोध कराता है। कभी-कभी इस रंह्य तत्त्व को ज्ञातव्य ‘मद (ऋ. 10.107.4) भी कहा जाता है। यह ‘मद' निःसन्देह प्रेमानन्द रूपी सोम की ओर संकेत करता है , इसीलिए रंह, धातु का प्रयोग प्रायः सोम3 के साथ हुआ है। अन्यथा उसका प्रयोग अग्नि (ऋ. 8.19.6), मरुतः (ऋ. 1.85.5) अथवा किसी अन्य ज्योतिस्तत्त्व (ऋ. 10.118.3) की गति के लिए होता है। नव मनुष्यरथ उपर्युक्त पूर्वरथ से इस अर्थ में भिन्न है कि जहाँ पूर्वरथ सहज वृत्तियों अथवा दुष्प्रवृत्तियों से संचालित होने से पाप-पङ्क में फँसता जाता है,  वहाँ नव मनुष्यरथ इष्टियों और मतियों से गतिशील होकर ऊर्ध्वमुखी रहने वाला अति मानसिक रथ है।

अहंपूर्व रथ

 यही अति मानसिक रथ अश्विनौ का अहंपूर्व रथ (ऋ. 1.181.3)। है जिसे मन से भी अधिक वेगवान् (मनसः जवीयान्) कहा जाता है । इसे  चित्तवृत्तिनिरोधपूर्वक की जाने वाली योग-समाधि भी कह सकते हैं; परन्तु वेद के अनुसार यह कोई एकाङ्गी आन्तरिक साधना नहीं है। इसमें  सफलता उस आत्मविस्तार अथवा अति वैयक्तिकता के बिना सम्भव नहीं है जिसे अहमुत्तरत्व (शौ. 3.8.3) कहा जाता है । इस ‘अहमुत्तर स्तर पर ही सामाजिक विघटन रूपी ‘भेद' नामक दैत्य का नाश करके उस ‘वशा' नामक शक्ति (शौ 12.4.29) को प्राप्त किया जा सकता है जो समस्त  नव निर्माण एवं दैवीसृष्टि करने वाली एक विलक्षण गाय के रूप में बहुचचित है । अहमुत्तरीय प्रयासों में (अहमुत्तरेषु) ही अमित्रविनाश, प्रजाजन की एकता तथा क्षत्रिय शक्ति का वर्धन निहित है (शौ. 22.1)।।

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1 तैसं 6.6.7.10, मैसं 4.7.2

2 काठसं 29.2

3 ऋ. 9.97.2, 110.3, 109.4, 86.47


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इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि ‘बृहद् राष्ट्र के प्रसंग में इस अहमुत्तरत्व के अन्तर्गत आने वाले संगतिकरण एवं समन्वय को आवश्यक1 माना जाए, क्योंकि इसी प्रक्रिया द्वारा उस समाज का विकास सम्भव है जो सभी व्यक्तियों के मनों को अपने मन से और अपने चित्त को दूसरे के चित्त से जोड़ सके तथा सभी हृदयों को अपने वश में करके उन्हें अपने मार्ग का  अनुवर्ती बना सके ।--

अहं गृभ्णामि मनसा मनांसि मम चित्तमनु चित्तेभिरेत ।।

मम वशेषु हृदयानि वः कृणोमि मम यातमनुवर्त्मान एत ।।(शौ 3.8.6)

इष्टयः

इष्टयः इष्टि शब्द का बहुवचन है जो इषु इच्छायाम्, इष्3 अभीक्ष्ण्ये तथा इष्4 गतौ से निष्पन्न हो सकता है। परन्तु वेद में इष्टि शब्द उसी इच्छा, आभीक्ष्ण्य एवं गति की ओर संकेत करता है जो अश्वमेध स्वर्ग अथवा लोक जैसे किसी उच्च लक्ष्य5 से सम्बन्धित हो । अतः तैत्तिरीय ब्राह्मण के अनुसार इष्टयः मूलतः एष्टयः (आ इष्टयः) हैं। परोक्षप्रियता के कारण इष्टयः कहा जाता है-- 'एष्टयो ह वै नाम ता इष्टय इत्याचक्षते परोक्षेण परोक्षप्रियाः इव हि देवाः ।6 अतः इष्टि को समवेत, सामूहिक अथवा सबकी संश्लिष्ट सदिच्छा कहा जा सकता है । ऐसी इष्टियों द्वारा प्रेरित कर्म को भी इष्टि कहा जाता है। इन्हीं इष्टियों को यज्ञकर्म भी कह सकते हैं। इसी प्रकार की इष्टियों द्वारा देवों ने इन्द्र की इच्छा की और उसे पाया (तैब्रा 1.5.9.2) । अतः जिन इष्टियों द्वारा नव मनुष्य रथ को रंह्य माना गया है वे कोई सामान्य इच्छाएँ आदि नहीं; अपितु उदात्त सदिच्छाएँ ही हो सकती हैं। इसीलिए इष्टापूर्त शब्द की व्याख्या करते हुए इष्टि को यज्ञ से सम्बद्ध (तैसं 1.7.3.3) माना गया है। इसी कारण इष्टि का अर्थ यज्ञ हुआ ।

मतयः :

इष्टयः के समान मतय: भी नव मनुष्यरथ को गतिशील करने वाले

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1 शौ. 3.8.1-3

2 पाधा 6.6.1

3 पाधा 9.56

4 पाधा 4.19

5 तैसं 2.9.13.1; 12.2.1; 4.9

6 तैब्रा 2.9.13.1; 12.2.1; 4.9


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साधन हैं । इष्टयः जहाँ मनुष्य के हृदय पक्ष का प्रतिनिधित्व करती हैं वहाँ मतयः मूर्धापक्ष की शक्तियाँ हैं । इष्टयः के समान मतयः भी कुछ विशेषताएँ रखती हैं। मन1 ज्ञाने, अथवा मनु2 अवबोधने से निष्पन्न मति शब्द का बहुवचन वेद में इष्टयः के समान अच्छे अर्थों में ही प्रयुक्त होता है। मननजन्य मत एवं मति के समानार्थक होने से, अश्विनौ को जहाँ ‘मतवचता'3 कहा जाता है, वहाँ उन्हें ‘नावा मतीनाम्’4 से भी सम्बद्ध माना जाता है। इन दोनों उदाहरणों के साथ अश्विनौ के ‘मनोतरा'5 विशेषण को रखने से स्पष्ट हो जाता है कि मत और मति दोनों अति मानसिक स्तर की ओर संकेत करते हैं जहाँ सोमपा, उरू एवं एवं शुभस्पति इन्द्र के आविर्भाव के समय मतयः उसे चाटती हुई6 कही जाती हैं। अन्यत्र स्वर्विदः मतयः इन्द्र को आलिंगन करती7 हुई बताई गई हैं। इससे स्पष्ट है कि उक्त नव मनुष्यरथ को गतिशील करने वाली मतियाँ अति मानसिक स्तर की वस्तु हैं । इस प्रकार इष्टियों और मतियों से प्रेरित यह रथ सहज इच्छाओं एवं विचारों से नहीं, अपितु अन्तरात्मा की उन द्विविध शक्तियों से गतिशील होता है जिनके पारिभाषिक नाम क्रमशः इष्टयः तथा मतयः हैं। क्रमशः भावपक्ष एवं ज्ञानपक्ष की द्योतक ये शक्तियाँ अन्य प्रसंगों में क्रमशः पूर्वपक्ष और अपरपक्ष अथवा साम एवं ऋक नाम से दो हरी8 कही जाती हैं।

आदर्श मनुष्यरथ :

मनुष्यरथ के विषय में ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे स्पष्ट है। कि यहाँ मनुष्य के एक आदर्श व्यक्तित्व की ओर संकेत है । सर्वोत्कृष्ट रूप में इस व्यक्तित्व को सस्नि रथ के रूप में कल्पित किया गया है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है यह माधुर्यपूर्ण तथा स्नेहसिक्त व्यक्तित्व है जिसमें आनन्दरस रूपी सोम सर्वत्र प्रवाहित हो रहा है। इसी को एक ऐसा ज्योतिष्मान् त्रिचक्र सुखरथ बताया जाता है जिसके किसी अतिरिक्त स्वरूप का पान भी किया जा सकता है --

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1 पाधा 4.65

2 पाधा 8.9

3 ऋ. 1.46.5

4 वही, 7

5 ऋ. 146.2; 5

6 शौ 20.23.5

7 शौ 20.17.1

8 पूर्वापरपक्षौ वा इन्द्रस्य हरी ताभ्यां हीदं सर्वं हरति । षब्रा 1.1

ऋक्सामे वै हरी । माशबा 4.4.3.6


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ज्योतिष्मन्तं केतुमन्तं त्रिचक्रं सुखं रथं सुषदं भूरिवारम् ।

चित्रामघा यस्य योगेऽधिजज्ञे तं वां हुवे अतिरिक्तं विबध्यै ।।ऋ. 8.58.3 मनुष्यव्यक्तित्व के इस रहस्यमय स्तर को अनूचान और योगयुक्त ब्राह्मण की ‘संवित्'1 अवस्था भी कहा जाता है। इस रसमयता के कारण ही ब्राह्मणग्रन्थों ने रथ शब्द को रस का रूपान्तर मान कर व्याख्या की है। गोपथब्राह्मण में रथ शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार दी गई है--

तस्य रसमपीडयत् स रसोऽभवद्रसो ह वा एष तं वा एतं रसं सन्तं

रथ इत्याचक्षते परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विषः।2 यह वस्तुतः आन्तरिक आनन्दरस से परिपूर्ण अनुभूति है। इसी को कवित्वमयी भाषा में, वेद में अन्यत्र सुरा का अन्तर्पेय3 कहा गया है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि यह रथ रसमय होने के साथ-साथ ज्योतिर्मय भी कहा गया है।  

इसलिए इस व्यक्तित्व रूपी रथ को उसी मूल प्राण का विस्तार अथवा विकास कहा जा सकता है जिसको पहले ‘प्राणो वै सम्राट् परमं ब्रह्म4 कहा गया है। यह प्राण रूपी परमं ब्रह्म निस्सन्देह असीम ज्योति से मंडित है । अतः इसकी रश्मियों की ही अनेक अश्वों के रूप में कल्पना की गई प्रतीत होती है । ये रश्मियाँ उक्त मूल प्राण के रूपान्तर मात्र हैं, इसलिए ब्राह्मणग्रन्थों में प्राणाः रश्मयः5 की उक्ति उपलब्ध होती है । मूल प्राण रूपी ब्रह्म रथ भी है और अश्व भी। उसी के अनेक रूपान्तर होकर जो मनुष्य व्यक्तित्व में सर्वत्र कार्य कर रहे हैं उनके ज्योतिर्मयस्वरूपों को अनेक अश्वों के रूप में कल्पित करना स्वाभाविक ही है। ब्रह्मप्राण ही मूल देव है और अन्य देव सब उसी एकदेव के विभिन्न स्वरूपों को प्रकट करने वाले हैं । अतः जब उस एक देव की अश्व के रूप में कल्पना की गई तो अन्य सब देवों को अश्व में अन्वायत्त6 माना गया। जैसा कि देव शब्द के धात्वर्थ से संकेत मिलता है सभी देव मूलदेव के समान ही ज्योतिर्मय हैं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि प्रायः सभी देवों के अश्वों का वेद में

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1 यो अनूचानो ब्राह्मणो युक्त आसीत्का स्वित्तत्र यजमानस्य संवित् । ऋ. 8.58.1 2 गोब्रा 1.2.21

3 भोजा जिज्ञुरन्तः पेयं सुरायाः । ऋ. 10.107.9

4 माशा 14.6.10.3

5 प्राणा: रश्मयः तैब्रा 3.2.5.2]

6 अश्वे वे सर्वा देवता अन्वायत्ताः । तैब्रा 3.8.7.3


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उल्लेख हुआ है। सभी अश्व किसी न किसी प्रकार की ज्योति से युक्त हैं । इसलिए उनके विशेषणों अथवा नामों में अरुष, हरित, श्वेत, कृष्ण, श्याव, अरुण, चित्रा, अरुणा, पिशंग, शोण, बभ्रु, पृषती, सारंग, हिरण्य आदि अनेक रंगों1 के द्योतक शब्दों का प्रयोग होता है।

अश्वों की ज्योतिर्मयता का स्रोत :

उक्त विभिन्न रंग वाली ज्योति का स्रोत पूर्वोक्त ज्योतिष्मान् रथ रूपी व्यक्तित्व ही है क्योंकि इसी के योग से वह ‘चित्रामघा'2 उत्पन्न होती है जो विभिन्न रंगों वाली होने से चित्रा है तथा ‘म' नामक विष का हनन करने के कारण मघा कही जाती है। यह चित्रामघा वस्तुतः वह ब्रह्मज्योति है जिसको बहुधा समिद्ध होने वाली एक ही अग्नि तथा सम्पूर्ण विश्व में प्रभूत होने वाला एक सूर्य भी कहा जाता है--

एक एवाग्निर्बहुधा समिद्ध एकः सूर्यो विश्वमनु प्रभूतः ।।

एकैवोषाः सर्वमिदं वि भात्येकं वा इदं वि बभूव सर्वम् ।। ऋ. 8.58.2

इस घट-घट वासी ब्रह्मज्योति को ही उसके विभिन्न आयामों में अनेक देवों के रूप में और उसकी किरणों को विविध रंगों वाले अश्वों के रूप में कल्पित किया गया है।

इस ब्रह्मज्योति को ही वेद में ॐ कहा जाता है जो अश्व (अग्नि, इन्द्र आदि देवों) के रूप में होकर मनोमयकोश में अनेक मनोजव अश्वों का रूप3 धारण करता है। यह उ वस्तुतः ओंकार है जो पदपाठ में 'ॐ

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1 श्वेत] ऋ. 1.116.6; 118.9; 10.39.10; 7.77.3; ऐब्रा 6.35, तांब्रा 16.12.4; जैब्रा 2.116; 3.188; माशब्रा 3.6.2.5; 4.1.19.1

कृष्ण] माश 13.4.2.3; तांब्रा 12.13.26; तैसं 5.7.1.2; 3.1

[श्याव] ऋ. 10.68.11; शौ 20.16.11; पै 3.22.6; 8.6.5; 6.4.8. काठसं 22.8; कसं 35.2.1 [अरुण] ऋ. 1.92.15; 113.14; 88.2; जैब्रा 2.331;, [चित्रा] ऋ. 1.115.3;, 7.75.6; 4.52.2; 10.75.7 [अरुणपिशंग] तैसं 6.6.11.6; जैब्रा 1.197; [शोण] ऋ. 3.35.3; [बभ्रु] ऋ. 10.34.11;, पै 1.94.1 [पृषती] ऋ. 5.55.6; 58.6 [सारंग] माश 13.5.4.2 [हरित] ऋ. 1.13.3; 115.3 शौ. 13.2.6; 7 [हिरण्य] ऋ. 5.55.6;  शौ 20.131.5 [अरुष] ऋ. 1.118.5; 4.43.6; 7.97.6; 7.75.6

2 चित्रमघा यस्य योगेऽधिज्ञे तं वां हुवे अतिरिक्तं पिबध्यै । ऋ. 8.58.3

3 अश्वम् अग्निम् आज्यम् इन्द्रं तान् उ कृण्वे मनोजवान् ।(अश्वत्थमग्निमाज्यं दूतान् कृण्वे मनोजवान्- पैसं ९.२९.१)- पैसं 9.25.11


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रूप में लिखा जाता है और यही अनेकविध होकर ऊमा अथवा ऊमासः कहे जाने वाले देवों के रूप में भी कल्पित1 किया जाता है। इन्हीं को कभी-कभी रथ को त्वरित गति देने वाले अश्वों के रूप में भी कल्पित किया जाता है जो हमारी मनीषा की रक्षा2 करते हैं । यह ॐ भी वह ज्येष्ठ तत्व है जो सद्यः उत्पन्न होकर 'विश्वे ऊमाः' का रूप धारण करके शत्रुओं का3 विनाश करता है और व्यान तथा अव्यान प्राण का रूप धारण करके स्नेहसिक्त (सस्नि) व्यक्तित्व में संगत4 होता है।

 ॐ ही वेद में उरु लोक, उरु ऊँ लोक अथवा ॐ लोक कहा जाता है। ऋग्वेद में कहा गया है कि सत्यमन्त्रा पितरों ने गूढ़ज्योति को ढूँढा और उषा5 को उत्पन्न किया। इसी प्रकार ऋग्वेद में इसी सत्या और महती उषा को सत्य और महान् देवों के साथ उत्पन्न होने वाली एक ज्योतिधारा6 के रूप में माना गया प्रतीत होता है। सत्या होने के कारण ही उषा जिन अश्वों के द्वारा सब भुवनों का चक्कर लगाती है वे ऋतयुक्त7 हैं। अन्यत्र वह भद्रा तथा ऋतजातसत्या8 अथवा ऋतसदन से प्रबुद्ध होती हुई9 कही गई है। उषा उ ज्योति ही है इस मत की पुष्टि दयानन्द कृत ‘ओम्' शब्द की व्याख्या से भी हो जाती है। उन्होंने ‘ओ३म्' शब्द के ‘उ' से अभिप्राय हिरण्य, तैजस् और वायु10 लिया है। हिरण्य अग्नि का और तैजस् आदित्य का प्रतीक है। अग्नि, वायु और आदित्य के स्थान पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यौ प्रसिद्ध हैं। इसीलिए उषा का पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यौ से सम्बन्ध है--

अग्निवाय्वादित्यदेवतानां पृथिव्यादिकं स्थानमित्येतत्प्रसिद्धमेव ।

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1 तुलना करो ऋ. 5.51.1; 52.12; 7.39.4; 10.6.7

2 ते नोऽवन्तु रथतूर्मनीषां.....। ऋ. 10.77.8

3 तदिदास भुवनेषु ज्येष्ठं यतो जज्ञ उग्रस्त्वेषनृम्णः ।।

सद्यो जज्ञानो नि रिणाति शत्रूननु यं विश्वे मदन्त्यूमाः ।। वही 10.120.1

4 वावृधानः शवसा भूर्योजाः शत्रुर्दासाय भियसं दधाति ।

  अव्यनच्च व्यनच्च सस्नि सं ते नवन्त प्रभृता मदेषु ।। वही 2

5 गूळ्हं ज्योतिः पितरो अन्वविन्दत्सत्यमन्त्री अजनयन्नुषासम् । 7.76.4

6 सत्या सत्येभिर्महती महद्भिः देवेभिः । 17.75.7

7 यूयं हि देवीर्ऋतयुग्भिरश्वैः परिप्रयाथ भुवनानि सद्यः । ऋ. 4.51.5

8 ता घा ता भद्रा उषसः पुरासुरभिष्टिद्युम्ना ऋतजातसत्याः । वही 4.51.7

9 ऋतस्य देवीः सदसो बुधाना गवां न सर्गा उषसो जरन्ते । वही 4.51.8

10 सत्यार्थप्रकाशः; प्रथम उल्लास


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अस्मिन्नर्थे सम्बन्धाय कस्यचिन्मन्त्रस्य पाठे पठति-त्रयो घर्मास उषसं  सचते । वायुरुषसं सचतेऽसावादित्य उषसं सचते ।1

इस ज्योतिष्मती ब्राह्मी उषा के पूर्वोक्त चित्रामघा नाम से उसके विभिन्न रंगों वाली रश्मियों को अनेक अश्वों के रूप में कल्पित किया गया है। इस प्रसंग में यह भी उल्लेखनीय है कि जहाँ स्वयं उषा को अश्वा2 कहा जाता है वहाँ उसका अश्वावती3 विशेषण भी महत्वपूर्ण है। 'अश्वावती' का अर्थ यदि घोड़ों से युक्त किया जाए तो उषा के प्रसंग में वह उतना ही हास्यास्पद होगा जितना कि गोमती को गायों से युक्त मानना । बृहदारण्यकोपनिषद्4 में उषा को मेध्य अश्व का शिर कहा गया है और ब्राह्मणग्रन्थों में प्राय: सूर्य5, अग्नि6 अथवा ईश्वर7 को अश्व नाम दिया गया है और तैत्तिरीय ब्राह्मण में उसका सम्बन्ध परा और परावत को दिया जाने वाले के साथ बताया गया है। इससे अश्व का प्रतीकात्मक स्वरूप पूर्णतया सिद्ध हो जाता है। श्री अरविन्द8 के मत में अश्व' शब्द के धात्वर्थ से प्रेरणा, शक्ति, प्राप्ति और सुखभोग के भाव इसके अन्य अभिप्रायों के साथ निकलते हैं और इन सभी अर्थों को हम जीवन रूपी अश्व (घोड़े) में एकत्र हुआ पाते हैं, जो कि सब अर्थ प्राणशक्ति की मुख्यमुख्य प्रवृत्तियों को सूचित करते हैं। अश्व या घोड़ा जीवन की महान् क्रियाशील एवं प्राणमय शक्ति की मूर्त प्रतिमा है और निरन्तर उन दूसरी प्रतिमाओं के साथ जुड़ा हुआ है जो कि चेतना की द्योतक हैं। इस प्रकार से डॉ. फतहसिंह ने अपनी पुस्तक 'भारतीय सौन्दर्यशास्त्र की भूमिका'9 में लिखा है कि अश्व को सोम की इच्छा शक्ति का प्रतीक मानना होगा । अतः स्पष्ट है कि अश्वावती उषा पिण्ड में समस्त चेतनाओं और इच्छाशक्ति की प्रतीक है ।

     यह सब लिखने का प्रयोजन यह है कि जिस मनुष्य-व्यक्तित्व को रथ-रूप में कल्पित किया गया है वह वस्तुतः ज्योतिर्मय आन्तरिक चेतना

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1 तांब्रा 20.15.2-3

2 अश्वे न चित्रे अरुषि । ऋ. 1.30.21

3 वही 1.48.2; 123.12; 7.80,3 इत्यादि।

4 बृउ 1.1.1

5 ऐब्रा 6.35

6 माशब्रा 3.6.2.5; गोब्रा 1.4.11

7 माशब्रा 1.3.3.5; तैब्रा 3.8.12.7; 3.9.13.2

8 वेद-रहस्य, प्रथम खण्ड, पृ. 63

9 पृ-115


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का प्रतीक है और उस ज्योति की रश्मियाँ ही अनेक अश्वों के रूप में मानी गई हैं। उस मूल चेतना का मूल एकीकृत रूप अश्व अथवा अश्वा रूप में प्रस्तुत करके उसके विभिन्न आयाम या पक्ष माने गए हैं। ये ही आयाम अथवा पक्ष विभिन्न देवनामों से जाने जाते हैं। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश में मुख्य सात रंगों के विविध प्रकार के मिश्रण से प्रकृति में अनेक रंग दिखाई पड़ते हैं उसी प्रकार उस चेतना को भी अहं बुद्धि, मन, पञ्च ज्ञानेन्द्रियों तथा पञ्च कर्मेन्द्रियों के परिप्रेक्ष्य में अनेक रूपों का माना जा सकता है। परन्तु इनका सर्वोत्कृष्ट रूप वह है जिसे हम भाव-समाधि में प्राप्त करते हैं। उसमें इच्छाशक्ति अथवा भाबनाशक्ति की प्रधानता होती है। इसलिए अश्व अथवा रथ के विभिन्न वर्णनों में क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति के साथ भावनाशक्ति की रसमयता प्रायः दृष्टिगोचर होती है। इस बात की पुष्टि में ही आगे कुछ अश्वसूक्तों का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए, पिण्डाण्डीय चेतना रूपी अश्व का चित्र उपस्थित किया गया है। यही अश्व किस प्रकार अश्वमेध नामक प्रसिद्ध अश्व का आधार बनता है, यह भी आगे के एक अध्याय में बतलाया जाएगा।

रथ के पौराणिक संदर्भ

रथ पर टिप्पणी

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